घनी हरीतिमा बीच बसा
यह कैसा उपवन है
सघन घरों के कानन में
रम्य मनोहर आँगन है
बादल घिरते साँझ सकारे
सृष्टि का मंजुल वर है
मन वितान अगरू सा महके
मधुरम पाखी कलरव है
अनुपम थाती वात्सल्य की
कभी सुख है कभी दुख है
सौरभमय मृदुल बयार सा
जीवन - राग यही है
राग-द्वेष और ईर्ष्या-छल से
मुक्त देवालय सम है
दिव्य स्त्रोत परमानन्द का
प्रथम वसन्त सुमन है
मृग छौने सा चंचल चित्त
करता इसमें विचरण है
ईश्वर के वरदान सदृश
नैसर्गिक सुख -सार यही है
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