उलझी हुई “जिग्सॉ पजल” लगती है जिन्दगी
जब इन्सान अपनी समझदारी के फेर में
रिश्तों को सहूलियत अनुसार खर्च करता है ।
*
सुनामी की लहरों सरीखी है लिप्सा की भूख
कल ,आज और कल का कड़वा सच
युद्धों का पेट मानवता को खा कर भरता है ।
*
उलझी हुई “जिग्सॉ पजल” लगती है जिन्दगी
जब इन्सान अपनी समझदारी के फेर में
रिश्तों को सहूलियत अनुसार खर्च करता है ।
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सुनामी की लहरों सरीखी है लिप्सा की भूख
कल ,आज और कल का कड़वा सच
युद्धों का पेट मानवता को खा कर भरता है ।
*
अच्छी बात तो नहीं
फ़िज़ूल बातों को तूल दिया जाए
व्यर्थ की बहस क्यों बढ़ाएँ
नहीं बनती आपस में तो
कोई बात नहीं..,
फिर से अजनबी हो जाएँ
अनावश्यक औपचारिकताओं में
उलझना कैसा..?
मिलते-जुलते नहीं विचार
तो इस बारे में अधिक
सोचना क्या..?
सुने मन की और मन की करते जाएँ
वक़्त का तक़ाज़ा है
अपनी मुट्ठी बाँध के रखना
खोल कर मुट्ठी
क्यों अपना सामर्थ्य कमजोर करना
अच्छा है खुद पर यक़ीन ..,
जब तक जीयें अपने पर यक़ीन करते जाएँ
***
बालपन में पापा के
काफ़ी नज़दीक होती हैं
बेटियाँ..,
सारे आकाश के चन्दोवे सा
लगता है
उन्हें पापा का हाथ
जिसके तले
सरदी,गरमी और बरसात में
महफ़ूज़ समझती हैं
वे अपने आपको..,
दिन भर कामों में उलझी
माँ का व्यक्तित्व उनको
पापा के समक्ष गौण सा लगता है
लेकिन ..,
जैसे ही बेटियाँ
बचपन की दहलीज़ से
बड़प्पन के आँगन में जुड़ती है
तब ..,
जीवन की परिभाषा
बदल सी जाती है
अनुभूत जीवनानुभव..,
उनको माँ के अस्तित्व का
बोध कराते हैं
और तब बेटियों को
पूरे घर को सरल सहज भाव से
एक सूत्र में जोड़ती
माँ के आगे
पापा उलझे-उलझे
नज़र आते हैं
***
बर्फ की कम्बल ओढ़े
पर्वत श्रृंखलाओं की
गगनचुंबी चोटियाँ ..,
सिर उठाये
मौज में खड़े त्रिशंकु वृक्ष
जिधर नज़र पसारो
मन्त्रमुग्ध करता..,
अद्भुत और अकल्पनीय
प्रकृति का सौंदर्य
मन को समाधिस्थ करता है ।
किसी पहाड़ की
खोह से ..,
कल-कल ,छल-छल
मोतियों सा बिखरता
काँच सरीखा पानी
आँखो के साथ मन
तृप्त करता है ।
कंधों पर अटकी टोकरियाँ
बोझ से लदे
फूल से मुस्कुराते आनन
सुन्दरता के प्रतिमान गढ़ते हैं ।
शहरी परिवेश में पला-पढ़ा
गर्वोन्नत- आत्ममुग्ध मनुष्य
अपनी ही नज़र के मूल्यांकन में
शून्य हो जाता है
जब..,
उर्ध्वमुखी पहाड़ों और
अधोमुखी घाटियों में
देवदूत सरीखे बादल
धीरे-धीरे उतरते देखता हैं ।
***
बस इसके लिए चन्द ख़्वाहिशों के पर कुतरने पड़े ।
🍁
बेहिसाब अनियंत्रित धड़कनें न जाने
कौन सा संदेश देना चाहती हैं…,
तुम्हारे आने का..,या मेरे जाने का ।
🍁
वक़्त के साथ प्रगाढ़ता दिखाने की धुन में
रिश्ते भी बोनसाई जैसे लगने लगते हैं ..,
कांट-छांट के बाद मोटे लेंस के चश्मे की दरकार होगी।
🍁
तुम्हारे नेह की जड़ें गहरी जमी हैं
दिल की ज़मीन पर..,
बहुत बार खुरचीं मगर दुबारा हरी हो गई ।
🍁
अजब सी दुनिया की रीति
वयस घटती फिर भी बढ़ती
वक्त की गठरी सदा उलझी हुई क्यों है
रिक्त होते समय-घट का , नियम यही है
मौन में तो सदा जड़ता
बोलने में ही प्रगल्भता
खामोशी पर शोर रहता भारी सा क्यों है
सही सदा लीक, बस चिन्तन नगण्य है
लहर तट तक आए जाए
हवा मोद में इठलाए
रेत पर फिर क्षुद्र जलचर तड़पते क्यों हैं
निज हित ऊँचे , समय सब का नही है
नित्य करें धरती के फेरे
चन्द्र संग उडुगण बहुत से
चल-अचल में नियम , आदमी ऐसा क्यों है
प्रश्न तो हैं , मगर उत्तर नहीं हैं
***
सुनहरी रेत में
सुघड़ता से पग धरती
पदचिह्नों पर ..,
पदचिह्न एकाकार करती
वह चली जा रही है धीरे-धीरे
ढाई अक्षर का शाश्वत स्वरूप
यूँ भी बना करता है
अनन्त अन्तरिक्ष विस्तार में
तरू-पल्लव की सरसराहट में
पक्षियों की चहचहाहट में
बारिश की बूँदों के धरती से
विलय में…,
प्रेम का सृजन हुआ करता है
कबीर का प्रेम..
निर्गुण ब्रह्म में सब कुछ देखता है
सूर का प्रेम ..,
शिशु मुस्कुराहट में खेलता है
गृहस्थी के सार में साँसें लेता है
तुलसी का प्रेम
तो अरावली की उपत्यकाओं में
गूँजता है मीरां का प्रेम
प्रेम सागर मंथन का फल है
कहीं वह शिव कण्ठ मे गरल
तो कहीं..,.
देवों का अमृत घट है
***