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मंगलवार, 7 मार्च 2017

"क्षणिकाएँ"

(1)       
              
पगडंडियों में बिखरे फूल-पत्तों को देख कर
एक ख्याल सिर उठा कर मुझ से एक
सवाल पूछता है --”वसन्त आता है
तो ठीक है , प्रकृति सज  सी जाती है
मगर साथ में पतझड़ क्यों ?
क्या चाँद में दाग जरुरी है ।

(2)

बादलों की रजाई से आँख-मिचौली खेलते चाँद से
मैनें एक सवाल पूछा --”तुम्हारी चाँदनी की रोशनाई से
नीले अम्बर की देह पर , तुम्हारे नाम कुछ लिख छोड़ा था
फुर्सत मिली क्या? मेरा लिखा पढ़ा क्या?

XXXXX

2 टिप्‍पणियां:


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"