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रविवार, 19 मार्च 2017

“अवसर”


स्कूल में दसवीं कक्षा में अनिवार्य सा कर दिया था कि
प्रवेश-पत्र लेने आने से पूर्व तक हर छात्र-छात्रा को “साक्षरता-अभियान” के अन्तर्गत किसी एक अनपढ़
को अक्षर-ज्ञान से पारंगत करना है । कई बार दूर - दराज मौहल्लों में हमें समूह में स्कूल की तरफ से ले जाया
जाता था जहां की अधिकांश महिलाएं और बालिकाएं  अक्षर-ज्ञान से वंचित थीं । मगर 
कहते हैं न कि इन्सान सदा अपने लिए shortcut ढूंढता
है , मैंने भी ढूंढ लिया था । घर काम 
करने आने वाली महरी जिन्हें हम चाची कहते
थे - उनकी बेटी । अक्सर वह चाची के व्यस्त होने पर
काम के लिए आया करती थी , मैंने अपने मिशन को पूरा करने के लिए उसे चुना । जब भी वो काम के लिए
आती मैं कापी-पेन्सिल लेकर अपने मिशन को पूरा
करने के लिए जुट जाती । मूडी होने के कारण
कभी वह ध्यान से पढ़ती तो कई बार पढा़ई को बेकार
काम बता कर मुझे निराश कर देती । 
एक दिन उसने बर्तन साफ करते हुए बडी़ सी थाली
में मिट्टी भर कर अंगुली से अपना नाम उकेर कर
मुझे आवाज दी -- 'देख ठीक है !’
मैंने​ खुशी से लगभग चिल्लाते हुए कहा -- 'वाह !
तू तो बड़ी intelligent निकली ।'
गर्मियों में बिजली गुल होने पर पंखे - कूलर बंद
 होते ही रात के समय आस-पास की आवाजें 
साफ सुनाई देती हैं । शादी के गीतों की आवाजें 
सुन कर पूछने पर पता चला महरी की बेटी की 
शादी है। दूसरे दिन मैंने पूछा --’ आप इतनी सी 
उम्र में उसकी शादी क्यों कर रहीं हैं ? मां ने मुझे
 टोका --'पढा़ई कर ! बड़ों की बात में नहीं बोला 
करते ।’ लेकिन चाची ने उत्तर दिया बड़ी शांति से -- 'मेरे जितना कद हो गया है उसका , घर संभाल लेती है ।
अच्छा वर मिल रहा था अवसर हाथ से कैसे जाने देती ।'
 लगभग चार-पांच साल बाद एक दिन  वो गली के
छोर पर खड़ी नगर-पालिका में निर्वाचित हमारे ward member को लताड़ रही थी -- ‘ नालियां कितनी
गंदी हैं ?  कूड़े के ढेर गली के कोने पे लगे पडे़ हैं। किस
बात के नगरपालिका सदस्य हैं आप ? हमारे गांव चलकर देखो आप ! मजाल है कहीं अव्यवस्था मिल जाए।’
उसकी हिम्मत से अचंभित थी मैं । जब वह घर
मिलने के लिए आई तो पता चला कि वो अपने ससुराल
में अपने वार्ड की निर्वाचित सदस्य 
थी । नगरपालिका चुनाव में उसका वार्ड  महिलाओं के
लिए सुरक्षित सीट वाला था । वो साक्षर थी “अवसर“ मिल रहा था और वो अवसर चूकने वालों में से नही थी ।

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- "मीना भारद्वाज"