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रविवार, 14 मई 2017

“जननी”

तेरा उड़ता आँचल
तपते थार में बरगद की छाँव सा
स्नेहसिक्त स्पर्श तेरा
गंगाजल की बूँद सा
थामे तेरी अगुँली
मैं दुर्गम मग तय कर पाऊँ
जो तू ना हो साथ मेरे
नीरव तम में घिर जाऊँ
सागर के भीषण झंझावत में
जब जीवन नैया डोले
विश्वास भरी तेरी वाणी
कानों में अमृत घोले
'प्रकाश-स्तम्भ' मेरी राहों की
पथ-प्रदर्शक मेरी रक्षक !
जीवन जय-पराजय तुझे समर्पित
जननी मेरी तेरी जय ! तेरी जय !

XXXXX

2 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! अप्रतिम और अनूठा भाव. माँ सरस्वती की आप पर कृपा बनी रहे. उस जननी की जयकार में मेरा स्वर मिला लें :
    http://vishwamohanuwaach.blogspot.com/2017/05/blog-post_13.html

    जवाब देंहटाएं
  2. इतनी सुन्दर‎ सराहना के लिए‎ हृदयतल से आभार विश्व मोहन जी .

    जवाब देंहटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"