Followers

Copyright

Copyright © 2020 "मंथन"(https://www.shubhrvastravita.com) .All rights reserved.

गुरुवार, 4 मई 2017

“नींद”

झिलमिल चाँदनी रात की,
भोर की लालिमा बन जाती ।

नींद कारवां से भटकी मुसाफिर,
बन्द दृग पटलों में भी नही आती ।

चँचल हठीली जादूगरनी,
कितनी मनुहार कराती ।

घर से निकली सांझ के तारे संग
भोर के तारे संग छिप जाती ।

XXXXX

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"