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शनिवार, 5 अगस्त 2017

“मौन”

फिजाओं में शोर बहुत है
मौन की चादर अपने वजूद से
लपेट मन किसी  कोने में
गहरी नीन्द में सो रहा है 
कस कर शरीर की खूटियों से
बाँधा है ऐसे कि किसी हवा के झौके से
नींद में कहीं खलल ना पड़ जाए
खलल पड़ेगा भी कैसे…?
दिमाग ने वरदान जो दे रखा है
कुम्भकर्ण की तरह सोने का .

XXXXX

2 टिप्‍पणियां:


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"