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गुरुवार, 10 अगस्त 2017

"चाँद"



क्षितिज  पर उठता  
पूर्णिमा का चाँद ,
रजत के थाल सा।
आसमान के आँगन में उतरता,
सिन्दूरी ज्वाल सा ।
व्योम-धरा का प्रेम प्रतीक,‎
किसी तरूणी के बाल गोपाल‎ सा ।  
तमाल तरूवर की शाख पे अटका
प्रकृति के अनुपम उपहार सा ।

XXXXX

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूबसूरत चित्रण।मीना जी प्रकृति मेरा भी प्रिय विषय है हमेशा से।आपने बहुत सुंदर लिखा।

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  2. रचना‎ सराहना हेतु बहुत बहुत‎ आभार श्वेता जी .आपकी रचनाएँ कुछ‎ कुछ‎ पढ़ी हैं मैने आप बहुत अच्छा लिखती हैं .

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    1. जी, आपकी सहृदयता है मीना जी आप स्वयं भी बहुत सुंदर लिखते है:)) बहुत बहुत आभार आपका।

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  3. यादों को समेटने का यह अन्दाज़ वाह क्या कहने

    जवाब देंहटाएं
  4. संजय जी हृदयतल से हार्दिक धन्यवाद .

    जवाब देंहटाएं
  5. वह ... चन्द्रमा का सजीव चित्रण ... शब्दों में चांदनी खिल उठी हो जैसे ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. रचना‎ सराहना हेतु‎ हृदयतल से धन्यवाद दिगम्बर जी .

      हटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"