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मंगलवार, 7 मार्च 2017

"क्षणिकाएँ"

(1)       
              
पगडंडियों में बिखरे फूल-पत्तों को देख कर
एक ख्याल सिर उठा कर मुझ से एक
सवाल पूछता है --”वसन्त आता है
तो ठीक है , प्रकृति सज  सी जाती है
मगर साथ में पतझड़ क्यों ?
क्या चाँद में दाग जरुरी है ।

(2)

बादलों की रजाई से आँख-मिचौली खेलते चाँद से
मैनें एक सवाल पूछा --”तुम्हारी चाँदनी की रोशनाई से
नीले अम्बर की देह पर , तुम्हारे नाम कुछ लिख छोड़ा था
फुर्सत मिली क्या? मेरा लिखा पढ़ा क्या?

XXXXX

शनिवार, 4 मार्च 2017

"ख़त"

मन की खाली स्लेट पर मैनें
तुम्हारे नाम एक खुला ख़त लिखा है
तुम्हारा मंद हास और आँखों का नूर
मेरे मन के खाली कैनवास  को
वासन्ती फूलों से ढक देता है
तुम्हारी दूरी मन में खालीपन और
सांसों में बोझिलपन भर देती है
वक्त जैसे थम सा जाता है और
मेरी सोचों का दायरा बस तुम्हारे
इर्द-गिर्द  ही सिमट कर रह जाता है
क्या करूं ---  मेरे जीवन की डोर
बस तुम्ही से बँधी है और तुमसे.
दूरी के अहसास से  मेरे मन में
बोझलपन और विचारों में रिक्तता भरती है ।

XXXXX

बुधवार, 1 मार्च 2017

"अपनी बात"


“होली” चन्द दिनों के बाद है .बसन्त-पंचमी से पीले रंगों की शुरुआत की छटा की छवि का चरमोत्कर्ष होली के त्यौहार पर होता है।  देश के सुदूर दक्षिण में स्थित प्रान्तों में यद्यपि होली अब अजनबी त्यौहार नही रहा ।  नीले - पीले रंगों से रंगे चेहरे याद दिला देते हैं कि परम्परा अब भी कायम है लेकिन ना जाने क्यों मुझे  सब कुछ सतही और ऊपर से ओढ़ा हुआ सा लगता है । मैं खो जाती हूँ उन यादों में जब हल्की सी सर्दी  में चंग की थाप के साथ होली के गीतों के साथ निकलती टोलियाँ और मोहल्ले के चौक में रात के समय नंगाड़े की लय से लय मिलाती डांडियों की गूंज और “गीन्दड़” देखने की उत्सुकता। जिसकीे प्रतीक्षा पूरे वर्ष में फाल्गुन महिने की याद दिलाया करती थी और उसी के साथ आरम्भ हो जाता था  परीक्षाओं का मौसम ।  मौहल्ले में गिनती रहती थी किस घर से कौन सा बच्चा  बोर्ड की ( दसवीं व बारहवीं) परीक्षा में बैठ रहा है । “तैयारी कैसी है ? नाम रोशन करना है अपने मोहल्ले का ..।” इस जुमले के साथ चौपाल पर बैठक लगाने वाले भी परीक्षाओं की तैयारी त्यौहारों की तैयारी के समान आरम्भ कर देते थे । कोई भी बच्चा परीक्षा के दिनों में कम से कम गली में खेलता-कूदता नजर आने पर इन लोगों की लताड़ से अपने आप को नही बचा पाता था। हम बीसवीं से इक्कीसवीं सदी में आ गए , पुरातन आवरण उतार फेंका  और नया  पहन कर वैश्ववीकरण (globalization) के दौर में शामिल गए । हमारे पास वक्त का अभाव हो गया  ,  प्रतिस्पर्धा भाव  (competition)  मुख्य हो गया और अपनापन कहीं खो सा गया । मगर  फिर भी रंगों की बहुरंगी आभा  खींचती रही अपनी ओर ….., वासन्ती और लाल-गुलाबी रंगों की कशिश जो ठहरी । सोचती हूँ अब हमारे गाँव भी cashless हो गए हैं  और demonetization भी हो गया है।  शहरों की हवाएँ गाँवों की तरफ बहने लगी है  कहीं जमीन से जुड़े अपनेपन को शहरों की हवा ना लग जाए ।

XXXXX

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

"क्षणिकाएँ"

( 1 )
कागज़ और कलम का रिश्ता
जब भी जुड़ता है , जीवन को एक अर्थ देता है ।
कभी यह बड़ा नामचीन  तो कभी
बड़ी गुमनामी झेलता है ।
( 2 )
आज कल हर तरफ
मछली बाजार  सा सजा है ।
कान फोड़ू शोर कायम है
और काम की बात ही गायब है ।
   
( 3 )
मन ने आज कुछ नया करने की ठानी है ।
अर्द्ध चन्द्र को धरती पे ला  और उसकी नौका बना ।
उफनते समुन्दर में कश्ती चलानी है ।

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सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

"मुश्किल"

तृषित कारवां ,पंकिल सरुवर
प्यास बुझाना आसान नही
मुश्किल सा है ।

तपती धूप में , गर्म रेत पर
नंगे पैरों का सफर आसान नही
मुश्किल सा है ।

बँधी आँखें , दूरस्थ मंजिल
लक्ष्य भेदना आसान नही
मुश्किल सा है ।

निर्गुण भक्ति, गूंगे का गुड़
स्वाद बताना आसान नही
मुश्किल सा है ।

XXXXX

       

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

“बचपन”

पहली बारिश की छम-छम
गीली माटी की खुश्बू
इस सौंधी सी सैकत से
कुछ सृजन करें मैं और तू ।

नन्हे हाथों से थपक-थपक
कभी घर कभी मंदिर बनता था
छोटे-छोटे तिनकों से
कभी तोरणद्वार सजता था ।

गुड्डे-गुड़िया की शादी में
कितना पकवान बनता था
टूटी नीम की टहनी  से
उस घर का  आंगन सजता था ।

बारिश का पानी गढ्डों में
उस गाँव का ताल बनता था
कागज की  छोटी सी  कश्ती
बजरे संग चप्पू चलता था ।

ये सब बचपन की बातें हैं
छुटपन में ही खो जानी है
कद बढ़ता है हम बढ़ते हैं
ये बातें फिर बेमानी है ।

XXXXX

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

"कशमकश"

छन्द अलंकारों से सजी कविता
मुझे सोलह श्रृंगार युक्त दुल्हन
तो कभी बोन्सई की
वाटिका समान लगती है ।

कोमलकान्त पदावली और
मात्राओं-वर्णों की गणना
उपमेय-उपमान ,
यति-गति के नियम
भाषा सौष्ठव सहित
छन्दों की संकल्पना ।

कोमल इतनी की छूने से
मुरझा जाने का भरम पलता है
नर्म नव कलिका सी
टूट जाने का डर लगता है ।

मुझे कविता कानन में
बहती बयार तो कभी
निर्मल निर्झर समान लगती है
नियम में बाँधू तो जटिल आंकड़ों की
संरचना जान पड़ती  है ।

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