(1)
कुदरत की आँखें नम और मनस्थिति कुछ गमगीन है
एक और दिवस बीता एक और युग अवसान हुआ ।
नश्वरता की प्रकृति प्रकृति को भी कहाँ भाती है ।।
(2)
व्यक्तित्व का अंश बन जाती हैं कुछ स्मृतियाँ
अहसासों को महसूसने में भी टीस ही देती हैं ।
बातों के जख्म आसानी से कहाँ भरा करते हैं ।।
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