जिन्दगी की पहेली
रेशमी लच्छियों सी
उलझी-उलझी मगर
अहसासों में मखमली
पहेली तो पहेली है
जितना प्रयास करो
समझने और सुलझाने का
उलझती ही चली जाती है
उसके बाद इन्सान न तो
गौतम बुद्ध बन पाता है
और न आम इन्सान ही रह पाता है
और न आम इन्सान ही रह पाता है
गौतम बुद्ध….
वो तो सिद्धार्थ थे
राजा शुद्धोधन के पुत्र
रोज की रोटी की फिक्र से दूर…
वक्त ही वक्त था
चिन्तन और मनन की खातिर
आम आदमी के पास
चिन्तन-मनन की खातिर
वक्त कहाँ होता है ??
भागते-दौड़ते….
यूं ही कट जाती है जिन्दगी
गत और आगत की जुगत में
और हाँ… .,
वक्त जब हाथ में आता है
तो वक्त और जिन्दगी..
दोनों का छोर
इन्सान के हाथों से
ना चाहते हुए भी
मुठ्ठी से बन्द बालू रेत सा
फिसल सा जाता है
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