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हाथ बढ़ा कर
तुषार की मलमल सी
चादर से ..,
छन कर आती
उजली हँसी सी धूप को
अँजुरी में भर कर
रखना तो चाहती हूँ अपने आस-पास
लेकिन..,
भोर की भाग-दौड़
और व्यस्त सी दिनचर्या से
चुरा के फ़ुर्सत के दो पल
मैं जब तक..,
पहुँचती हूँ खिड़की के पास
तब तक ..,
वह भी नाराज सखी सी
चली जाती है
इमारतों के झुण्ड
या फिर ..,
पेड़ों के झुरमुट की ओट में ..॥
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